रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए बेहतरीन है लाइफ साइकिल फंड

देश में सामाजिक सुरक्षा की कमी व रहन-सहन के बढ़ते खर्चों की वजह से रिटायरमेंट प्लानिंग का महत्व बढ़ गया है। फिर भी ज्यादातर निवेशक अपने सुनहरे दिनों के लिए 40 साल की उम्र के बाद ही बचाना शुरू करते हैं तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
जबकि सुखी रिटायरमेंट जीवन के लिए बचत जरूरी होती है और उम्र, सामाजिक हालत व निर्भरता के साथ परिवार में बढ़ोतरी, लाइबिलिटी व रोजगार के हिसाब से निवेश जरूरतें भी बदलती रहती हैं।
आम नियम यह है कि व्यक्ति जैसे-जैसे रिटायरमेंट के करीब पहुंचता है उसे निवेश से जुड़ा जोखिम घटाना चाहिए यानी इक्विटी में निवेश घटाते हुए डेट में अपना निवेश बढ़ाना चाहिए। हालांकि, किए गए निवेश का लगातार प्रबंध और उसकी समीक्षा करना प्रत्येक निवेशक के वश की बात नहीं होती है। ऐसे मामलों में लाइफ साइकिल फंड बहुत मददगार साबित होते हैं।
वैश्विक स्तर पर लाइफ साइकिल फंड
वैश्विक स्तर पर लाइफ साइकिल फंड दो भागों में बंटा होता है- टार्गेट डेट फंड और टार्गेट रिस्क फंड। टार्गेट डेट फंड या उम्र आधारित फंड के निवेश की समय-सीमा होती है जिसके तहत जैसे-जैसे व्यक्ति रिटायरमेंट के करीब आता जाता है निवेश की शैली आक्रामक से रुढि़वादी होती जाती है।
दूसरी तरफ टार्गेट रिस्क फंड जोखिम उठाने की क्षमता के आधार पर तय किए जाते हैं जैसे रूढि़वादी, मध्यम जोखिम और आक्रामक। इसमें निवेशक को निर्णय करना होता है कि प्लान कब स्विच किया जाए।
उदाहरण के तौर पर एक युवा निवेशक आक्रामक प्लान चुनेगा जबकि एक रिटायर्ड निवेशक रूढि़वादी प्लान। टार्गेट डेट फंड और टार्गेट रिस्क फंड दोनों के तहत एसेट एलोकेशन की नीति कुछ ऐसी होती है कि जैसे-जैसे रिटायरमेंट का वक्त करीब आता जाता है इक्विटी में निवेश घटाते हुए डेट में निवेश बढ़ाया जाता है।
देश में लाइफ साइकिल फंड
देश में उपलब्ध अधिकांश लाइफ साइकिल फंड म्यूचुअल फंडों के फंड ऑफ फंड हैं जो टारगेट रिस्क थीम पर आधारित हैं। हमारे यहां एसेट एलोकेशन की नीति आक्रामक, मध्यम और रूढि़वादी के अलावा अधिक आक्रामक और अधिक रूढि़वादी होती हैं।
कुछ फंड कंपनियां टारगेट डेट फंड भी मुहैया कराते हैं जो निवेशक की उम्र के अनुरूप एसेट एलोकेशन करते हैं। उदाहरण के लिए एक टार्गेट डेट 20 साल का फंड 20 साल के युवा निवेशक के लिए होगा जिसकी निवेश नीति आक्रामक होगी।
दूसरी तरफ, टार्गेट डेट 50 साल का फंड एसेट एलोकेशन की रूढि़वादी नीति अपनाएगा। अधिकतर फंड अपने प्लान में ऑटो स्विच की सुविधा उपलब्ध नहीं कराते हैं। इसलिए निवेशकों को अपनी जोखिम उठाने की क्षमता और टार्गेट डेट के अनुसार स्वयं ही विभिन्न प्लान में स्विच करना होता है।
पेंशन फंड रेगुलेटरी एंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (पीएफआरडीए) के नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) के अंतर्गत निवेशकों को ऑटो च्वाइस का विकल्प उपलब्ध कराया जाता है। यह भी टारगेट डेट थीम पर आधारित है। ऑटो च्वाइस विकल्प के तहत रिटायरमेंट की उम्र करीब आने के साथ ही निवेश की शैली आक्रामक से रूढि़वादी होती जाती है।
प्रदर्शन
देश में लाइफ साइकिल फंडों का प्रदर्शन अच्छा है और ये रिटायरमेंट प्लानिंग में लंबी अवधि के ख्याल से अच्छे होते हैं। इन फंडों का प्रदर्शन लाइफ साइकिल थीम पर आधारित होती है। आक्रामक, मध्यम जोखिम और रुढि़वादी फंडों ने अपने बेंचमार्क की तुलना में अच्छा प्रदर्शन किया है।
तालिका एक में आप देख सकते हैं कि कोई निवेशक जैसे ही वह रिटायरमेंट की ओर उन्मुख होता है वह आक्रामक से मध्यम जोखिम और फिर रूढि़वादी फंडों में स्विचिंग कर सकता है।
अगर निवेशक ने अपने 25 वें साल से आक्रामक फंड में 1,000 रुपये की मासिक एसआईपी शुरू की और उसने 40 वें साल में मध्यम जोखिम वाले फंड की ओर स्विच किया और अंत में वह रिटायरमेंट के समय यानी कि 55 वें साल में रूढि़वादी प्लान की ओर गया तो वह करीब 53 लाख रुपये प्राप्त करेगा जबकि उसका कुल निवेश 4.20 लाख रुपये का होगा। आगे चलकर इसमें जीवन के विभिन्न चरणों के लिहाज से रकम जोडऩी चाहिए।
निष्कर्ष
लाइफ साइकिल फंडों को रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए बेहतरीन माना गया है। लाइफ साइकिल फंड ऐसे हाइब्रिड फंड होते हैं जहां पर निवेशक के जीवन चक्र के अनुसार डेट व इक्विटी में एलोकेशन बदलते रहते हैं।
ये फंड लाइफ साइकिल सिद्धांत पर काम करते हैं जो किसी निवेशक के विभिन्न जीवन चरण होते हैं। अमूमन ये तीन चरण होते हैं-एक्युमुलेशन, कंसोलिडेशन व डिस्ट्रीब्यूशन। ये फंड इसी रणनीति पर ही काम करते हैं। इनमें निवेश के पहले किसी फाइनेंशियल प्लानर की सेवा लें साथ ही इसकी लागत व कराधान भी देख लें।
जिजू विद्याधरण - लेखक क्रिसिल रिसर्च के फंड्स एंड फिक्स्ड इनकम रिसर्च के डायरेक्टर हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।
क्या है लाइफ साइकिल फंड?
लाइफ साइकिल फंड ऐसे हाइब्रिड फंड हैं जिनके तहत निवेशकों के जीवन चक्र के अनुसार डेट व इक्विटी में निवेश का एलोकेशन बदला जाता है। ये फंड लाइफ साइकिल सिद्धांत पर काम करते हैं। अमूमन इनके ३ चरण होते हैं- एक्युमुलेशन, कंसोलिडेशन व डिस्ट्रीब्यूशन।
एक्युमुलेशन : यह चरण आम तौर पर किसी के करियर का शुरूआती बिंदु होता है। युवावस्था में समय ज्यादा होता है जबकि जिम्मेदारियां कम होती है और जोखिम सहन करने की क्षमता अधिक। लिहाजा इसमें एसेट एलोकेशन एग्रेसिव होना चाहिए ताकि लंबी अवधि में ज्यादा कमाई हो सके। इस के अनुसार इक्विटी जैसे ज्यादा जोखिम वाले निवेश के विकल्प में ज्यादा एक्सपोजर होना चाहिए।
प्रिजर्वेशन/कंसोलिडेशन : यह प्रौढ़ावस्था के लोगों का चरण होता है। बच्चे की शिक्षा, शादी या निर्भर अभिभावकों के साथ जिनकी जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं। लिहाजा उनकी जोखिम उठाने की क्षमता अपेक्षाकृत कम होती है। इस चरण में उनको इक्विटी व डेट के बीच संतुलन बना कर चलना होता है।
डिस्ट्रीब्यूशन : यह चरण रिटायरमेंट या रिटायरमेंट के पहले का होता है। इस चरण में प्रोफेशन या कारोबार से नियमित आय की संभावना कम होती है लिहाजा इस समय वित्तीय योजना ऐसी होनी चाहिए कि रिटायरमेंट का जीवन आराम से गुजरे। ऐसे में लिक्विड फंड, शार्ट टर्म डेट फंड, फिक्स्ड मैच्योरिटी प्लान आदि में निवेश होना चाहिए। रिटायरमेंट के बाद नियमित आय के लिए जमा पैसों से पेंशन स्कीम भी खरीदी जा सकती है।








