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चार चुनौतियों से चौकन्ना रहे चीन

 
Source: बिजनेस ब्यूरो   |   Last Updated 01:34(18/01/12)
 
 
 

थॉमस फिंगेर
लेखक स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी के इंटरनेशनल स्टडीज में फेलो रह चुके हैं। हाल में उनकी किताब रिड््यूसिंग अनसर्टेनिटी : इंटेलिजेंस एंड नेशनल सिक्यूरिटीज आई है।

पिछले दो दशक से चीन सफल ग्लोबलाइजेशन का प्रतीक देश बना हुआ है। दुनिया की अर्थव्यवस्था से सामंजस्य बढ़ाता हुआ ऐसा देश, जिसने अपने करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकालने में कामयाबी हासिल कर ली है। लेकिन विश्व अर्थव्यवस्था से चीन के जुड़ाव ने उसकी सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों को बड़ा ही कि या है। चीन के सामने इन चुनौतियों से जूझने की राह में कई अड़चनें खड़़ी हैं।


ग्लोबल ट्रेंड्स हर देश को प्रभावित करते हैं, लेकिन चीन के बाहर और उसकी सीमा के बाहर की गतिविधियों से वह ज्यादा ही प्रभावित है। कई बार हालात से उसके नियंत्रण खत्म हो जाते हैं।  चीनी नेता इन चुनौतियों की जटिलताओं और उनकी विविधताओं को समझते हैं लेकिन वह इनसे एक-एक कर निपटने को प्राथमिकता देते लगते हैं।


ये नेता इन चुनौतियों से किस तरह निपटते हैं, उसका चीन पर पडऩे वाला असर बेहद अहम होगा। ये कदम दुनिया पर भी असर डालेंगे। वल्र्ड इकोनॉमी में प्रतिस्पद्र्धा बढ़ती जा रही है और ये चुनौतियां दुनिया में चीन की बढ़ती जा रही भूमिका से जुड़ी हैं।
समय पर बेहतर फैसले ले पाने की अपनी क्षमता की वजह से चीन ने तीन दशक पहले देंग के नेतृत्व में शुरू कि ए गए आर्थिक सुधारों का जबरदस्त लाभ हासिल किया। इन तीन दशकों में चीन का काफी विकास हुआ।


चीन की अर्थव्यवस्था पहले बंद थी लेकिन 1978 में इसे खोल दिया गया। आज चीन के कई नागरिक पहले की तुलना में अच्छा जीवन जी रहे हैं और कई परिवार तेजी से मध्यवर्ग में प्रवेश कर रहे हैं। आकांक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं चरम पर हैं। यह बहुत अच्छी स्थिति है लेकिन इसने चीनी नेताओं के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। चीनी नेताओं के लिए यह इसलिए भी कठिन है क्योंकि लोगों की उम्मीदों को पूरा करना लगातार कठिन होता जा रहा है।


खासकर चीन के लिए अब बीते दशकों की ग्रोथ रेट और जीवन स्तर में इजाफे को बरकरार रखना मुश्किल साबित होगा। चीन ने अपने विकास के लिए जो नीतियां तय की हैं उसका एक नतीजा यह है कि पहले आसान काम करो फिर कठिन काम को हाथ में लो। इस नीति के तहत चीन ने ऐसे नतीजे हासिल किए , जो अनुभव बढ़ाते हैं और अगले दौर की चुनौतियों से सामना करने का विश्वास जगाते हैं। देखा जाए तो इस तरह की रणनीति का हर अगला दौर पिछले से ज्यादा कठिन होता है।


इस रणनीति के कई आयाम हैं। मसल, अपेक्षाकृत ज्यादा विकसित तटीय क्षेत्रों के विकास पर पहले ध्यान दिया जाए फिर कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर, कुपोषण और अशिक्षा से घिरे इलाके की ओर बढ़ा जाए। इन नीतियों के एक और नतीजे के तौर पर चीन कम लागत वाली असेंबलिंग अर्थव्यवस्था के तौर पर अंतरराष्ट्रीय प्रोडक्शन चेन से जुड़ गया।


आपको अगर सफलता चाहिए तो लगातार टेक्निकल और प्रबंधकीय सीढ़ी पर अच्छी तरह चढऩे का हुनर होना चाहिए। चीन ने जानबूझकर अपनी घरेलू मांग को कम रखा है। इस तरह की नीतियों का असर यह होगा कि चीन बढ़ती महंगाई और प्रॉपर्टी के बुलबुले से घिरा रहेगा। चुनौतियों की दूसरी श्रेणी उन नीतियों  से निकली है, जिनके तहत चीन के सामने पहले से ज्यादा प्रतिस्पद्र्धा है और आगे भी इसका सामना करते रहना होगा।


चीन ने वर्षों तक निर्बाध तरीके से दुनिया के लिए खोली गई अपनी अर्थव्यवस्था का लाभ उठाया। अमेरिकता में जिमी कार्टर सरकार की पहल पर चीन ने खुद को जापान, ताइवान और दूसरी तेजी से बढ़ती आधुनिक अर्थव्यवस्था जैसा बनने की ओर कदम उठाया और सोवियत संघ के ढहने तक विश्व बाजार में प्रतिस्पद्र्धा रहित ग्रोथ का फायदा उठाया।


इस बीच, ब्राजील, भारत और दूसरे गुटनिरपेक्ष देश कई साल तक इस खेल से दूर ही रहे। इस तरह सोवियत रूस और अमेरिका के बीच शीत-युद्ध का चीन ने भरपूर लाभ लिया। अब तक चीन अकेले ही बाजार में था लेकिन अब कई अर्थव्यवस्थाएं बाजार में प्रतिस्पद्र्धा कर रही हैं।  चीन के सामने तीसरी चुनौती आबादी को लेकर है।


चीन में आबादी एक बड़ा हिस्सा है जो अमीर होने से पहले ही बुजुर्ग हो जाएगी। जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर-पूर्व एशियाई और यूरोपीय देशों में ही आबादी के बुजुर्ग होते जाने की समस्या है। लेकिन इन देशों में सामाजिक सुरक्षा का अच्छा तंत्र है। चीन में यह चीज नहीं है। चीन को अपनी बुजुर्ग होती आबादी के देखभाल के लिए आगे बड़े संसाधन की जरूरत पड़ेगी।


चीन की चौथी बड़ी चुनौैती उसकी राजनीतिक प्रणाली के केंद्रीकृत होने से पैदा हुई है। पिछले तीन दशकों के दौरान चीन ने खुद को एकल राज्य के तौर पर स्थापित कर लिया है। यहां संघीय सिस्टम नहीं है, जिसमें प्रांतीय सरकारों के पास महत्वपूर्ण और फैसले लेने के अहम अधिकार होते हैं। इससे चीन को जरूरत के हिसाब से समय पर समन्वय के मामले में आसान फैसले लेने में सफलता मिली। इससे फैसले लेेने के जटिल ढांचे से मुक्ति मिल जाती है।


लेकिन इस सिस्टम के अपने खतरे और कीमत होती है। इसमें खतरा यह होता है कि ज्यादातर फैसले मुट्ठी भर अधिकारी लेते हैं और वह भी एक बेहद छोटे समय और छोटे संदर्भ में। इन अधिकारियों के पास अक्सर समय और एकाग्रता की कमी होती है और ज्ञान भी सीमित होता है।


लेकिन जैसे-जैसे चीन ज्यादा आधुनिक और समृद्ध होता जा रहा है उसकी विविधता बढ़ती जा रही है। स्थानीय लोगों, अर्थव्यवस्थाओं के विभिन्न सेक्टरों, हित समूहों और क्षेत्रों की विविधता भरी दुनिया है। जाहिर है उनकी आकांक्षाएं भी अलग-अलग है। ऐसे में विभिन्न समूहों के बीच संतुलन बना कर आगे बढऩे से बड़ी चुनौती और क्या होगी। ऐसे हालात में शासन को हमेशा सही होने की चुनौती से निपटना होगा और ज्यादातर समय गलतियों से बचने की गुंजाइश नहीं होगी।


सच तो यह है कि चीन की भूमिका से जितनी बड़ी उम्मीद होगी, गलतियों की आशंका भी और बढ़ जाएंगी। चीन की इन चुनौतियों के जिक्र करने का मतलब यह नहीं है कि हम उसके भविष्य के प्रति निराशावादी नजरिये से घिरे हैं। आगे चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में क्या सहयोग करेगा वह इस बात पर निर्भर करता है कि अपनी घरेलू समस्याओं के हल के लिए वह ग्लोबल मंच पर कितना सक्रिय कदम उठाता है। साथ ही भविष्य में अन्य देशों के कदम भी चीन को मदद करने या बाधा पहुंचाने में सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
(येल ग्लोबल मैगजीन से साभार)

 
 
 
 
 
 
 
 
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