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उम्मीदों पर कितना खरा उतरेंगे ओबामा

ब्रुशस्टोक | Feb 08, 2013, 01:27AM IST
 
 


अगर अमेरिका के इतिहास पर नजर डाले तो यह पता चलता है कि वहां पर जितने भी राष्ट्रपति दोबारा चुनाव जीते हैं उनके दूसरे कार्यकाल में विदेश नीति और अर्थ नीति ही प्रमुख मुद्दा रही है।

बात जहां तक बराक ओबामा की है तो वह भी इस रास्ते पर चल सकते हैं लेकिन उनके पिछले कार्यकाल के दौरान अपनाई गई नीतियों कारण उन्हें कुछ दिक्कतें हो सकती हैं क्योंकि वे पहले से ही अप्रभावी और अलोकप्रिय हो गई हैं। 12 फरवरी को बराक ओबामा देश को संबोधित करेंगे।

पूरी दुनिया को उनके भाषण का इंतजार है क्योंकि इसमें वे अपने दूसरे कार्यकाल में अपनाई जाने वाली नीतियों का खाका तो पेश करेंगे ही साथ ही अपनी नई टीम की घोषणा भी करेंगे। हालांकि कुछ लोगों को दिए जाने वाले पदों की घोषणा हो चुकी हैं जिनमें विदेशी मंत्री के पद पर जॉन कैरी और रक्षा मंत्री के पद पर चक हीगल की नियुक्त शामिल हैं।

उम्मीद की जा रही है कि ओबामा घरेलू मुद्दों को अपनी प्राथमिकता में रखेंगे और उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता अर्थव्यवस्था होगी। अमेरिका में हो रहे विभिन्न शोध में भी इस बात का पता चल रहा है कि जनता भी यही चाहती है कि सबसे बड़ा मुद्दा अर्थव्यवस्था ही होना चाहिए। एक शोध में शामिल 86 फीसदी लोगों ने अर्थव्यवस्था को सबसे ज्यादा प्राथमिकता पर लेने की बात कही है।

इस बारे में हो रहे शोध में अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता पर लेने वालों की संख्या भले ही कम या ज्यादा हो सकती है लेकिन सभी शोध परिणामों में एक कॉमन बात यह है कि हर शोध में लोगों ने अर्थव्यवस्था को प्राथमिकता पर रखने की बात कही है। खास बात यह है कि अमेरिका जनता ने अर्थव्यवस्था के मुद्दे को आतंकवाद से भी ज्यादा प्राथमिकता दी है।

जहां तक विदेशी मुद्दों का सवाल है तो इन पर जनता के समर्थन में कमी देखी जा रही है। खास बात यह है कि अपने दूसरे कार्यकाल के उद्घाटन भाषण में राष्ट्रपति ने ईरान, चीन और इजराइल-फलस्तीन के मुद्दों पर कहा है कि इन मामलों में अमेरिका के लिए चुनौतियां बढ़ रही हैं। हालांकि राष्ट्रपति ने खुलकर इनका नाम नहीं लिया। उन्होंने अफगानिस्तान का जिक्र करते हुए कहा कि दशकों चले इस युद्ध का अब अंत होने वाला है।

अगर जनता की बात करें तो 60 फीसदी लोग चाहते हैं कि दुनिया में जिन स्थानों पर युद्ध चल रहे हैं और उनमें अमेरिका शामिल है तो उसे वहां से जितना जल्दी संभव हो निकल जाना चाहिए। हालांकि ओबामा ने ये जरूर कहा कि युद्ध अब खत्म होने वाला है लेकिन उन्होंने इसके बारे में कोई निश्चित समय सीमा तय नहीं की।

अमेरिका ने नए विदेशमंत्री जॉन कैरी ने सीनेट में विदेश मामलों की समिति के सामने सीरिया के मुद्दे पर कहा है कि उन्हें नहीं लगता है कि सीरिया में अब बशर अल असद का शासन बहुत दिन तक चलने वाला है। हालांकि कैरी ने सीरिया में अमेरिकी संलिप्तता के बारे में कुछ नहीं कहा। प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा कराए गए एक सर्वे में 60 फीसदी अमेरीकियों ने कहा कि सीरिया में युद्ध को खत्म करना और शांति स्थापित करना अमेरिका की जिम्मेदारी नहीं है।

इस रिसर्च में 65 फीसदी लोगों ने सीरिया में अमेरिका द्वारा सैनिक भेजने का विरोध किया। हालांकि अमेरिका के राजनीतिक हल्के में भी सीरिया में सीधे सैनिक हस्तक्षेप का विरोध हो रहा है। इस हिसाब से अगर अमेरिका सीरिया में कोई हस्तक्षेप करता है तो उसे बहुत कम ही सपोर्ट हासिल होगा।

ओबामा प्रशासन के लिए ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी एक प्रमुख चुनौती होगी। विदेश मंत्री जॉन कैरी ने सीनेट में इस मुद्दे पर कहा है कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए जो भी संभव होगा, हम करेंगे। हालांकि ईरान के मुद्दे पर बहुसंख्य जनता ये चाहती है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल ना करे।

पिछले दिन इजराइल और फिलिस्तीन के बीच हुए संघर्ष पर बोलते हुए जॉन कैरी ने कहा कि इसे सकारात्मक रूप से लेना चाहिए और इससे हमें बातचीत के नए रास्ते मिल सकते हैं साथ ही दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर लाने का यह अच्छा मौका है।

उन्होंने कहा कि यह सही समय है जब हम पिछले चार सालों में अपनाई गई नीतियों में कमियों को ढूंढ़े और नए रास्तों की खोज करें। अगर इस मुद्दे की बात करे तो इस बात में कोई शक नहीं है कि अमेरिका की अधिकांश जनसंख्या की सहानुभूति इजराइल के साथ है जो हमेशा से रही है और अभी भी जारी है। मुश्किल से 10 फीसदी अमेरिकियों की सहानुभूति फिलिस्तीन के साथ है।

जहां तक चीन की बात है तो आधे से ज्यादा अमेरीकियों का मानना है कि अमेरिका को चीन के साथ मिलकर अपनी आर्थिक समस्याओं को हल करना चाहिए। ज्यादातर अमेरिकी लोगों का मानना है कि अमेरिका को चीन के साथ अपने संबंधों को मजबूती प्रदान करनी चाहिए।

जहां तक सैनिक शक्ति का सवाल है तो नए रक्षा मंत्री हीगल ने सीनेट में रक्षा मामलों की समिति के सामने यह कहा है कि अमेरिका अपनी सेना को दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना बनाए रखेगा और सैनिक शक्ति के मामले में दुनिया का गारंटर होने का अपना रुतबा भी वह कायम रखेगा। हालांकि अब सैनिक मामलों पर ज्यादा खर्च करने पर जनता का समर्थन घट रहा है और लोग चाहते हैं कि सैनिक शक्ति के बजाय दूसरे सामाजिक मुद्दों पर अपने खर्च को बढ़ाया जाए।

ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के मामले में अमेरिकी जनता का प्रदर्शन निराशा जनक रहा है। केवल 28 फीसदी जनता यह चाहती है कि इस साल राष्ट्रपति और कांग्रेस ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के एजेंडे को अपनी प्राथमिकता में रखे। हालांकि बराक ओबामा ने कहा है कि वे ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएंगे।

अब देखना यह है कि बराक ओबामा से बेहतरी की आस लगा रही अमेरिकी जनता और दुनिया की उम्मीदों पर वे कितना खरा उतर पाते हैं। इस बात में कोई शक नहीं है कि उनकी चुनौतियां बहुत बड़ी हैं लेकिन यह भी सच है कि अमेरिकी राष्ट्रपति दुनिया का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति माना जाता है।

ब्रुशस्टोक
लेखक प्यू रिसर्च सेंटर में ग्लोबल इकोनॉमिक एप्टीट्यूड के निदेशक हैं।

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