अवैध ड्रग ट्रायल पर सरकार 'गहरी नींद' में

सुप्रीम कोर्ट ने क्या-क्या कहा
सरकार 'गहरी नींद' में सो चुकी है। हम इस बात से काफी परेशान हैं कि कंपनियां देश के बच्चों का इस्तेमाल 'गिनी पिग' के तौर पर कर रही हैं।
देश के नागरिकों के स्वास्थ्य का ख्याल रखना सरकार का दायित्व है। मौतों की रोकथाम निश्चित तौर पर सुनिश्चित की जाए। अवैध ड्रग ट्रायल पर अवश्य रोक लगाई जाए।
सरकार अपनी बात कहने के लिए जरूर अदालत वापस आ सकती है। लेकिन उन लोगों का क्या होगा जो इस तरह के क्लिनिकल ट्रायल में अपनी जिंदगियां गंवा रहे हैं। इस तरह के ड्रग ट्रायल में जो लोग मर चुके हैं उन्हें उनकी जिंदगी वापस नहीं मिल सकती है।
अदालती फरमान
देश मे सभी ड्रग ट्रायल अब से केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की निगरानी में किए जाएंगे
दवाओं के अवैध क्लिनिकल ट्रायल की समस्या खत्म करने के लिए जल्द ठोस इंतजाम करे सरकार
बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) द्वारा देशभर में मानव पर दवाओं का अंधाधुंध क्लिनिकल ट्रायल जारी रखने पर सुप्रीम कोर्ट ने भारी नाराजगी जताई है। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को कहा कि दवाओं के बेरोकटोक क्लिनिकल ट्रायल के चलते पूरे देश में 'तबाही' जैसी स्थिति देखने को मिल रही है क्योंकि इस वजह से बड़ी संख्या में लोगों को अपनी जिंदगी गंवानी पड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों का यह 'गोरखधंधा' रोकने में विफल रहने को लेकर केंद्र सरकार की कड़ी खिंचाई की है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि अवैध ड्रग ट्रायल के भयावह मसले पर केंद्र सरकार 'गहरी नींद' में नजर आ रही है। इसके साथ ही सर्वोच्च अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि देश मे सभी ड्रग ट्रायल अब से केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव की निगरानी में किए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किए जाने वाले अवैध ड्रग ट्रायल की रोकथाम के लिए समुचित इंतजाम करने में केंद्र सरकार विफल रही है। यही कारण है कि एमएनसी की ओर से यह गड़बड़झाला बदस्तूर जारी है।
अदालत ने सख्ती बरतते हुए केंद्र सरकार से कहा है कि वह दवाओं के अवैध क्लिनिकल ट्रायल की समस्या खत्म करने के लिए जल्द-से-जल्द ठोस इंतजाम करे। न्यायमूर्ति आर एम लोढा और न्यायमूर्ति ए आर दवे की खंडपीठ ने सरकार से कहा है, 'देश के नागरिकों के स्वास्थ्य का ख्याल रखना आपका दायित्व है। मौतों की रोकथाम निश्चित तौर पर सुनिश्चित की जाए। अवैध ड्रग ट्रायल पर अवश्य रोक लगाई जाए।'
जब अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल सिद्धार्थ लुथरा ने यह दलील दी कि केंद्र सरकार ड्रग ट्रायल के लिए नियम बनाने पर विचार कर रही है तो खंडपीठ ने कहा, 'आप गहरी नींद में सो चुके हैं। हम इस बात से काफी परेशान हैं कि कंपनियां देश के बच्चों का इस्तेमाल गिनी पिग (जानवर) के तौर पर कर रही हैं। आप तो संसदीय समिति का भी सम्मान नहीं कर रहे हैं जिसने कहा है कि कंपनियां अपना गोरखधंधा चला रही हैं और आप महज नियमों का मसौदा दिखा रहे हैं।
इस मसले पर आपको निश्चित तौर पर अपने दायित्व की कुछ झलक दिखानी चाहिए। खंडपीठ ने गुरुवार को उस समय भी सरकार को काफी लताड़ा जब उसने यह दलील दी कि अवैध ड्रग ट्रायल के मसले पर गौर करने के लिए विभिन्न समितियां गठित की जा चुकी हैं और उनकी ओर से सुझाव मिलने के बाद वह फिर अदालत वापस आकर अपनी बात उसके समक्ष रखेगी। खंडपीठ ने कहा, 'आप जरूर अदालत वापस आ सकते हैं। लेकिन उन लोगों का क्या होगा जो इस तरह के क्लिनिकल ट्रायल में अपनी जिंदगियां गंवा रहे हैं।







