एक्सपेंस रेशियो को लेकर निवेशक न हों चिंतित

नियामक के कदम
सेबी ने म्यूचुअल फंडों को छोटे शहरों व नगरों के निवेश प्रवाह पर खर्च के लिए 0.3 फीसदी तक के ज्यादा एक्सपेंस रेशियो को वसूलने की मंजूरी दी
टोटल एक्सपेंस रेशियो (टीईआर) के बारे में निवेशक यह चिंता न करें कि एक्सपेंस रेशियो बढ़ जाएगा। इसकी बजाय वह कम लागत वाले प्रोडक्ट में
निवेश जारी रखें
सीधे निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सेबी का जो ताजातरीन कदम है उससे एक ही योजना में अगर निवेशक सीधे निवेश करेगा तो उसकी लागत वितरक के माध्यम से जाने की तुलना में कम होगी
अब म्यूचुअल फंड कंपनियों को अपनी योजनाओं की एडवाइजरी फीस के बारे में ज्यादा डिसक्लोजर करने होंगे
मौजूदा म्यूचुअल फंड उद्योग की बात की जाए तो अभी बड़े ऊहापोह की स्थिति है कि इन उत्पादों पर भरोसा कैसे किया जाए। दरअसल म्यूचुअल फंड उद्योग में हुए दो बदलावों ने धारणाओं को बुरी तरह से प्रभावित किया। इसी कारण आज स्थिति यह है कि म्यूचुअल फंड उद्योग तकरीबन उसी समान राशि के एसेट (परिसंपत्ति) का प्रबंधन कर रहा है जितने का प्रबंधन वह साल 1992 में तब किया करता था जब बाजार में एक ही कंपनी थी।
साल 1992 में सिर्फ एक कंपनी के रहने पर बाजार में म्यूचुअल फंड उद्योग की हिस्सेदारी लगभग 10 फीसदी थी और आज सुधारों के 18 सालों के बाद म्यूचुअल फंड बाजार में लगभग 50 कंपनियों के होने के बावजूद शेयर बाजार के इंडेक्स में इनकी हिस्सेदारी तीन फीसदी से भी कम है।
म्यूचुअल फंड उद्योग में एफडीआई के आने के बाद कई विदेशी कंपनियां आईं और उन्होंने निवेशकों की सेवा की पर इस उद्योग ने उनसे वे अच्छी बातें नहीं सीखीं, जिनसे इस उद्योग में आगे प्रगति हो सकती थी। जो उत्पाद बाजार में हैं उनमें निवेशकों का भरोसा खत्म हो रहा है।
साल 2012 में भारतीय प्रति भूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने कई बदलाव किए। सेबी के म्यूचुअल फंड रेगुलेशन में प्रस्तावित बदलावों का ध्येय एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) की प्रबंधनाधीन परिसंपत्तियों (एयूएम) को बढ़ाना था जबकि ऐसे निवेशक जो कई फंडों में सालों तक पैसा रखने के बावजूद अपना पैसा गवां चुके थे, को हाशिए पर रख दिया गया।
शुरूआत से ही म्यूचुअल फंड उद्योग पर वितरकों का कब्जा रहा है और उन पर उद्योग की निर्भरता 2009 में एंट्री लोड पर पाबंदी के बाद और बढ़ गई। इसने आगे चलकर म्यूचुअल फंडों में निवेशकों की सहभागिता पर असर डाला।
नियमों के तहत सेबी ने म्यूचुअल फंडों को छोटे शहरों व नगरों के निवेश प्रवाह पर खर्च के लिए 0.3 फीसदी तक के ज्यादा एक्सपेंस रेशियो को वसूलने की मंजूरी दी। इसका म्यूचुअल फंड कंपनियों ने मनमाना उपयोग किया। यहां पर हम यह बताना चाहेंगे कि टोटल एक्सपेंस रेशियो (टीईआर) के बारे में निवेशक यह चिंता न करें कि एक्सपेंस रेशियो बढ़ जाएगा।
इसकी बजाय वह कम लागत वाले प्रोडक्ट में निवेश जारी रखें और जहां तक अन्य निवेशकों की जेब पर पडऩे वाले असर की बात है तो हम नहीं चाहते कि निवेशकों की जेब पर असर पड़े। वैसे सेबी के इस बदलाव ने छोटे शहरों के निवेशकों पर बुरी तरह से असर डाला है। अगर स्कीम का प्रदर्शन बेंचमार्क के प्रदर्शन से कम है तो जिन फंड हाउसों की छोटे शहरों में ज्यादा मौजूदगी है उन्हें ही लाभ होगा।
अन्य दिशानिर्देशों में एएमसी को निवेशकों द्वारा निकासी किए जाने के दौरान योजना के पूरे एक्जिट लोड को कम करना होगा और एएमसी को 20 आधार अंक यानी 0.2 फीसदी तक की अधिक टीईआर की भरपाई मिलेगी। पर तब क्या होगा जब एक्जिट लोड से अर्जित की गई राशि से टीईआर ज्यादा होगा। इससे भी निवेशकों की लागत बढ़ेगी।
हालांकि 20 आधार अंकों के अतिरिक्त टीईआर की मंजूरी देने से निवेशकों पर असर पडऩा तो स्वाभाविक है पर एक्जिट लोड चार्ज का ध्येय रिडेम्पशन के मामले में निवेशकों के हितों की रक्षा करना है। अब कुल टीईआर शीर्ष 15 शहरों के मामले में बढ़ कर 2.70 फीसदी तक हो जाएगा और यह टॉप 15 शहरों के अलावा 3 फीसदी (30 बीपीएस समेत) होगा। टीईआर में बढ़ोतरी ज्यादा है लिहाजा म्यूचुअल फंड निवेशकों के हाथ में आने वाले रिटर्न पर इसका प्रभाव पड़ेगा।
सीधे निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सेबी का जो ताजातरीन कदम है उससे एक ही योजना में अगर निवेशक सीधे निवेश करेगा तो उसकी लागत वितरक के माध्यम से जाने की तुलना में कम होगी। इससे अब म्यूचुअल फंड कंपनियों को अपनी योजनाओं की एडवाइजरी फीस के बारे में ज्यादा डिसक्लोजर करने होंगे। अब उन्हें वन स्कीम न्यूमरस प्लान की मौजूदा रणनीति की बजाय ज्यादा पारदर्शी व निवेशक फ्रेंडली वन प्लान पर स्कीम मॉडल अपनाना पड़ सकता है।
म्यूचुअल फंड सीधे निवेशकों को अप्रोच करें, इसे प्रोत्साहित करने के लिए सेबी ने दो योजनाएं बनाई हैं। डायरेक्ट प्लान में हायर नेट एसेट वैल्यू होगी और डिस्ट्रीब्यूटर प्लान में कमीशन को समाहित करने के लिए तकरीबन 0.5 फीसदी अंक तक एनएवी कम होगी। बड़ी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियां और वितरकों का गिरोह शायद निवेशकों को शुल्क के लिए डायरेक्ट प्लान हेतु गाइड करेगा।
पर अधिकतर डिस्ट्रीब्यूटर इससे सहमत नहीं हैं। निवेशक जो कि एफडी, इंश्योरेंस व अन्य वित्तीय उत्पादों के बारे में वितरकों की मदद लेते हैं वे कोई फीस नहीं नहीं देते। लिहाजा क्वांटम म्यूचुअल फंड का भी यही भरोसा है कि वे म्यूचुअल फंड एडवाइस के लिए भी कोई शुल्क न दें।
फिलहाल म्यूचुअल फंड उद्योग में विलय व अधिग्रहण का दौर भी है। स्क्रोडर एक्सिस को तथा इन्वेस्टो रेलिगेयर को खरीद रही है। अगस्त में फिडेलिटी को एल एंड टी ने खरीद लिया। इसके अलावा आईएनजी वैश्य, दाइवा जैसे म्यूचुअल फंड कंपनियां देश से जाने की योजना बना रहे हैं। अब देखिए कि इसमें आगे क्या होता है।
- लेखक क्वांटम एसेट मैनेजमेंट कंपनी प्रा. लि. के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। प्रकाशित विचार उनके निजी हैं।







