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इकोनॉमी के लिए 2013 में भी राहत नहीं

प्रभाकर साहू | Dec 20, 2012, 00:20AM IST
 
 


निराश करने वाली नीतियों से लेकर बड़े सुधारों को उलट देने के तमाम मामले 2012 में दिखाई दिए। अर्थव्यवस्था के लिहाज से यह साल मुश्किल भरा था। यह साल मल्टीब्रांड रिटेल रिटेल में एफडीआई के राजनीतिक विरोध की छाया में शुरू हुआ और इसके बाद ऐसा कामचलाऊ बजट पेश किया गया, जिसमें बड़े आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने और राजकोषीय घाटे को कम करने की प्रतिबद्धता नहीं दिख रही थी।


सब्सिडी को नियंत्रित करने और विकास दर को आगे बढ़ाने के लिए उठाए जाने वाले कदमों का अभाव था। वर्ष, 2011 के शुरुआती दौर से ही धीमी हो चुकी निजी निवेश की रफ्तार को बढ़ाने के बजाय 1961 के आयकर कानून में संशोधन का प्रावधान बजट में था।


इसमें विदेशी कंपनियों की ओर से यहां किए जाने वाले अधिग्रहण सौदों की टैक्स देनदारी के संदर्भ में समीक्षा होनी थी। इधर, आर्थिक सुधारों को लागू करने के मामले में राजनीतिक प्रतिबद्धता की कमी, यूरोपीय अर्थव्यवस्था का ग्रोथ पर पड़े असर, कड़ी मौद्रिक नीति के साथ सुधार की दिशाहीन नीतियों और विदेशी रेटिंग एजेंसियों की ओर से निगेटिव रेटिंग की वजह से निवेश और इससे जुड़े माहौल में लगातार गिरावट देखी गई।


वर्ष, 2011 में निवेश में गिरावट तो थी ही। 2012 में घरेलू और विदेशी निवेश दोनों में और गिरावट का आलम था। लिहाजा सर्विस सेक्टर, निजी उद्योग, घरेलू मांग, सरकारी मांग और विदेशी कारोबार से रफ्तार हासिल करने वाली भारतीय अर्थव्यवस्था को दशक के दौरान सबसे कम ग्रोथ रेट से संतोष करना पड़ा।


वित्त वर्ष 2012 की पहली दो तिमाहियों ने 2011 की गिरावट का ही अनुसरण किया और इस दौरान ग्रोथ रेट सिर्फ 5.5 और 5.3 फीसदी रही। वर्ष, 2012 में अब तक भारतीय अर्थव्यवस्था के तीनों सेक्टरों का प्रदर्शन खराब रहा लेकिन मैन्यूफैक्चरिंग और खनन का प्रदर्शन खासा निराशाजनक और चिंताजनक रहा। ये सेक्टर श्रम सघन हैं और दूसरे सेक्टरों के ग्रोथ के लिए भी महत्वपूर्ण, इसलिए चिंता लाजिमी है। इसके अलावा व्यापार घाटे में बढ़ोतरी और निवेश की धीमी रफ्तार चिंता की अहम वजह रही हैं। मौजूदा वित्त वर्ष की पहली दो तिमाहियों में घरेलू मांग तो घटी ही है निर्यात दर में भी कमी का सामना करना पड़ा है।


निर्यात की धीमी रफ्तार के लिए भले ही विश्व अर्थव्यवस्था की धीमी रिकवरी एक वजह हो सकती है लेकिन उभरती अर्थव्यवस्थाओं में भारत का निर्यात सबसे कम रहा है। यह इस तथ्य के बावजूद कि रुपये के मूल्य में 25 फीसदी की गिरावट आई है। वित्त वर्ष, 2012 में इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर में भी निवेश और विकास की रफ्तार नहीं दिखी। पूरे साल, बिजली की आपूर्ति और मांग में भारी अंतर दिखा। इसमें बड़ी भूमिका कोयला खदान से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले की थी। इससे उत्पादन पर नकारात्मक असर साफ दिखा।


कृषि सेक्टर में देश की कुल श्रम आबादी की 55 फीसदी लगी हुई है। इस सेक्टर का भी प्रदर्शन खराब रहा है। बाद में हुुई मानसून की रिकवरी से भी फायदा नहीं हुआ। ऐसी स्थिति में 2013 में ज्यादा से ज्यादा उम्मीद छह फीसदी ग्रोथ रेट की ही लगाई जा सकती है। वर्ष, 2012 का खराब पहलू तो यह रहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था न सिर्फ कम निवेश की समस्या से जूझती रही बल्कि कारोबार का माहौल भी इसके पिछले साल से खराब ही रहा।


भ्रष्टाचार के बड़े स्कैंडल, अंतहीन मीडिया कवरेज, कीमतों में बढ़ोतरी का लंबा सिलसिला, काले धन के मुद्देे, आर्थिक सुधारों पर पॉलिसी पैरालिसिस की स्थिति और अन्ना हजारे के आंदोलन ने यूपीए-2 के राजनीतिक प्रबंधन बेहद मुश्किल बना दिया। इसके साथ ही राज्यों के चुनाव में भी कांग्रेस के खराब प्रदर्शन की वजह से यूपीए-2 नीतिगत सुधारों के मामले में ज्यादा सतर्क हो गया।


राजनीतिक दबाव तले पहले तो सरकार ने मल्टीब्रांड रिटेल में एफडीआई को टाल दिया और फिर  भूमि अधिग्रहण कानून, बैंकिंग, इंश्योरेंस में सुधार के साथ राजकोषीय प्रबंधन को मजबूती देने का कदम रोके रखा। इसके अलावा देश में भ्रष्टाचार पर चलने वाले आंदोलन से पैदा माहौल की वजह से आर्थिक नीतियों के प्रति अनिश्चितता का माहौल बन गया और घरेलू और विदेशी निवेशकों दोनों में डर समा गया।


काफी बाद में जाकर यूपीए-2 ने महसूस किया कि अगर ग्रोथ घट कर साढ़े पांच या छह फीसदी के दायरे में पहुंच गई तो यह मनरेगा जैसी सामाजिक योजनाओं को मुश्किल में डाल देगी। शिक्षा के अधिकार और खाद्य सुरक्षा पर भी असर पड़ेगा। और सबसे बड़ी दिक्क त लाखों युवाओं को नौकरियों से बाहर जाने के खतरे के तौर पर पैदा हो जाएगी।


यह यूपीए सरकार की सबसे बड़ी राजनीतिक आत्महत्या होगी। इन हालातों के मद्देनजर इसने सुधारों की ओर ध्यान देना शुरू किया और लगातार सात तिमाहियों के बाद हालात थोड़े सुधरते नजर आने लगे। इस साल नवंबर में मल्टीब्रांड रिटेल में 51 फीसदी एफडीआई को अनुमति देने के साथ ब्रॉडकास्टिंग में इसकी हिस्सेदारी 49 फीसदी से बढ़ा कर 75 फीसदी कर दी गई।


चार सार्वजनिक कंपनियों में विनिवेश की अनुमति मिली और नया भूमि अधिग्रहण विधेयक पारित हो गया। ये बड़े आर्थिक सुधार हैं और इससे निवेशकों को यह संदेश देने की कोशिश की गई है देश में कारोबार फिर पटरी पर आ चुका है। इसके अलावा कैबिनेट ने पेंशन और इंश्योरेंस में एफडीआई को मंजूरी दे दी। इसके साथ ही सब्सिडी में कटौती और राजकोषीय घाटे को कम करने की भी कोशिश जारी है।


बहरहाल, वित्त वर्ष 2012 की तीसरी तिमाही में सरकार की ओर से ग्रोथ रेट को सात से आठ फीसदी की धरातल पर लाने के संकेत दिखने लगे हैं। इन परिस्थितियों में 2013 के हालात बहुत अच्छे नहीं दिख रहे हैं। केंद्र का राजकोषीय घाटा जीडीपी के छह फीसदी के आसपास बना हुआ है और चालू खाते का घाटा भी तीन फीसदी के बराबर। इससे इकोनॉमी में बुनियादी असंतुलन पैदा होने का संकट बढ़ गया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमोडिटी के दाम में गिरावट आई है इसके बावजूद देश में आम इस्तेमाल की जरूरी चीजों के दाम लगातार ऊंचाई पर हैं।


इससे ब्याज दरें कम करने की संभावना काफी कम हो गई है। उम्मीद लगाई जा रही है कि सरकार राजकोषीय प्रबंधन को मजबूत करने के साथ-साथ वे सारे आर्थिक सुधार करेगी, जिससे निवेशकों का विश्वास लौट सके।


प्रभाकर साहू
लेखक इंस्टीट्यूट ऑफ इकोनॉमिक ग्रोथ में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। 2012 के आर्थिक हालात और 2013 की संभावना पर उनका यह लेख।

 
 
 

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