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लांग टर्म डेट फंडों में निवेश का माकूल वक्त

जिजू विद्याधरण | Jan 04, 2013, 01:47AM IST
लांग टर्म डेट फंडों में निवेश का माकूल वक्त

डेट फंडों में निवेश

खासियत   
प्रोफेशनल मैनेजमेंट ब्याज दर आउटलुक को देखते हुए फंड प्रबंधक निवेश करते हैं और उसे मॉनिटर करते हैं
डाइवर्सिफिकेशन विभिन्न सेक्टर और जारी कर्ताओं की प्रतिभूतियों में निवेश, इससे जोखिम कम होता है
नियमित आय अगर निवेशक डिविडेंड विकल्प चुनते हैं तो उन्हें डिविडेंड के रूप में नियमित आय हो सकती है
लिक्विडिटी ओपन एंडेड डेट फंडों की खरीद-बिक्री किसी भी कारोबारी दिन की जा सकती है

इन पर रखें निगाह
टैक्स बेनीफिट एक साल से अधिक अवधि का निवेश इंडेक्सेशन के साथ 20 फीसदी और बिना इंडेक्सेशन के 10 फीसदी के हिसाब से लांग टर्म कैपिटल गेन के योग्य होता है
ब्याज दर जोखिम निवेश से पहले निवेशकों को ब्याज दर चक्र पर निगाह डाली चाहिए। घटती ब्याज दर परिस्थितियों में लांग टर्म डेट फंड लाभ देता है जबकि इसके विपरीत परिस्थिति में शॉर्ट टर्म डेट फंड अच्छा कर सकते हैं
क्रेडिट रिस्क क्रेडिट रिस्क के आकलन के लिए निवेशक फंड के पोर्टफोलियो में प्रतिभूतियों के हिसाब से रेटिंग प्रोफाइल देख सकते हैं। निवेशक फंडों के क्रेडिट क्वालिटी रेटिंग भी देख सकते हैं
कॉन्सेंट्रेशन रिस्क   वैसे फंड जिनका डेट इंस्ट्रूमेंट पोर्टफोलियो डाइवर्सिफायड  हो जो किसी खास सेक्टर या जारीकर्ता में ज्यादा निवेश न करते हों, निवेश के लिए आदर्श होंगे
एक्जिट लोड   निवेशकों को यह देख लेना चाहिए कि ओपन एंडेड फंड से जल्द निकासी करने पर एक्जिट लोड कितना है

साल 2010 और 2011 में ब्याज दरों में बढ़ोतरी के दौर के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में इस बात के संकेत देखे जा रहे हैं कि ब्याज दरें मध्यावधि में घटेंगी। एक तरफ जहां भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने साल 2012 के दौरान केवल अप्रैल महीने में रेपो रेट में 0.50 फीसदी की कटौती कर 8.00 प्रतिशत कर दिया वहीं अब इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि आरबीआई घरेलू ग्रोथ को रफ्तार देने के लिए जल्द ही नीतिगत दरों में कटौती कर सकता है। जुलाई-सितंबर 2012 भारत का जीडीपी ग्रोथ 5.3 फीसदी रहा जो एक साल पहले की समान अवधि के 6.7 फीसदी के मुकाबले कम था।


महंगाई दर में नरमी के कुछ संकेत हैं नवंबर 2012 में यह 7.24 प्रतिशत पर रहा जबकि अप्रैल 2010 में यह 10.88 प्रतिशत था। इससे उम्मीद जगी है कि आने वाले महीनों में ब्याज दरों में कमी आएगी। दिसंबर 2012 की मध्य-तिमाही नीतिगत समीक्षा में आरबीआई ने कहा था कि महंगाई दरों के हालिया रुझानों से इसे जनवरी-मार्च 2013 की तिमाही में नीतिगत दरों के संदर्भ में गाइडेंस मिलेंगे।


क्रिसिल सेंटर फॉर इकॉनोमिक रिसर्च का नजरिया भी यही है कि आरबीआई साल 2013 की शुरुआत में मौद्रिक नीति में नरमी के लिए जगह बनाएगा। ब्याज दरों में कमी आने से लांग टर्म डेट फंडों को बड़ा लाभ होगा। लांग टर्म डेट फंड आम तौर पर घटती ब्याज दर परिस्थितियों में बेहतर रिटर्न अर्जित करते हैं।


लांग टर्म डेट फंडों को क्यों होगा फायदा?
लांग टर्म डेट फंडों में इनकम फंड और गिल्ट फंड भी शामिल होते हैं। इनकम फंड अपने कोष के एक बड़े हिस्से का निवेश कॉरपोरेट द्वारा जारी लांग टर्म डेट इंस्ट्रूमेंट्स में करते हैं। गिल्ट फंड केंद्र या राज्य सरकार द्वारा जारी बांडों में निवेश करते हैं।


फंड के पोर्टफोलियो में दैनिक आधार पर उतार-चढ़ाव आता रहता है जिसकी वजह अंतर्निहित डेट इंस्ट्रूमेंट की कीमतों में ब्याज दर गतिविधियां और लिक्विडिटी की स्थिति की वजह से बदलाव होती है। डेट इंस्ट्रूमेंट की कीमत और ब्याज दर (यील्ड) विपरीत दिशा में चलते हैं, जैसे ब्याज दरें घटने पर बांड की कीमतें बढ़ती हैं और ब्याज दरों में बढ़ोतरी के समय बांड की कीमतें घटती हैं। एक डेट फंड स्कीम का नेट एसेट वैल्यू (एनएवी) अंतर्निहित प्रतिभूतियों की कीमतों को प्रदर्शित करता है।


इसलिए, अगर ब्याज दरें घटती हैं तो डेट फंडों के एनएवी में बढ़ोतरी होती है। घटती ब्याज दर परिस्थितियों में लांग टर्म डेट फंडों को शॉर्ट टर्म डेट फंडों के मुकाबले ज्यादा लाभ होता है क्योंकि लांग टर्म डेट फंडों की अंतर्निहित प्रतिभूतियां दीर्घावधि की होती हैं। शॉर्ट टर्म डेट फंड, जिनके पोर्टफोलियो में अपेक्षाकृत कम अवधि की मैच्योरिटी वाली प्रतिभूतियां होती हैं, की कीमतों में ज्यादा बदलाव नहीं होता है क्योंकि वह जल्द मैच्योर होते हैं और खरीदी गई नई प्रतिभूतियां घटती ब्याज दर परिस्थितियों में कम यील्ड देते हैं।


गिल्ट फंडों में इनकम फंडों से कम क्रेडिट रिस्क
गिल्ट फंड और इनकम फंड दोनों में ब्याज दर गतिविधियों की वजह से मार्केट रिस्क होता है लेकिन गिल्ट फंडों में क्रेडिट रिस्क कम होता है क्योंकि वह केवल सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करते हैं। दूसरी तरफ, इनकम फंड सरकारी प्रतिभूतियों के साथ-साथ कॉरपोरेट बांडों में भी निवेश करते हैं।


बाजार चक्र की केस स्टडी
क्रिसिल ने एक मार्केट साइकिल केस स्टडी किया था ताकि पिछले 10 सालों के दौरान इनकम और गिल्ट फंडों के रिटर्न का विश्लेषण किया जा सके। जैसा कि आप टेबल में देख सकते हैं गिल्ट फंडों के बाद इनकम फंडों ने उस मार्केट साइकिल में अच्छा रिटर्न अर्जित किया जब ब्याज दरों में कमी का दौर था।


साल 2000-04, 2008 और अप्रैल 2012 के बाद जब ब्याज दरों में गिरावट आई तो डेट फंडों की श्रेणी में गिल्ट फंडों ने सबसे अधिक रिटर्न दिया उसके बाद इनकम फंडों का स्थान था। यह रिटर्न बैंकों के फिक्स्ड डिपॉजिट की तत्कालीन दरों की तुलना में भी अधिक था। कुछ ऐसी परिस्थिति अब बनने वाली है जब आरबीआई अगली तिमाही से दरों में कटौती करेगा। ऐसे में गिल्ट फंड और इनकम फंड डेट फंडों की श्रेणी में सबसे अच्छा प्रदर्शन कर सकते हैं।


निष्कर्ष
ऐतिहासिक रूप से घटती ब्याज दर परिस्थितियों में लांग टर्म डेट फंडों ने अच्छा रिटर्न दिया है। यह मानते हुए कि आने वाले समय में ब्याज दरों में कटौती होगी, लांग टर्म डेट फंडों के रिटर्न में इजाफे की उम्मीद है। हालांकि, रिटर्न कितना मिलेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि ब्याज दरों में कितनी कटौती होती है। यह पाया गया है कि बाजार चक्र की शुरुआत में निवेश करने वालों को बाद में निवेश करने वालों की तुलना में ज्यादा अच्छा रिटर्न मिला है।
- लेखक क्रिसिल रिसर्च के फंड्स एंड फिक्स्ड इनकम रिसर्च के डायरेक्टर हैं।

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