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जमीन अधिग्रहण बिल पर हायतौबा गलत

दीपक मंडल नई दिल्ली | Jan 01, 2013, 03:39AM IST
जमीन अधिग्रहण बिल पर हायतौबा गलत

क्या है खास
:जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास बिल, 2011 को मिली संसद से मंजूरी
:निजी सेक्टर के लिए अधिग्रहण हेतु 80 फीसदी जमीन मालिकों की
मंजूरी जरूरी
:पीपीपी परियोजनाओं के लिए 70 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी

जमीन अधिग्रहण बिल को कैबिनेट की मंजूरी मिल गई और अब इसे संसद में पारित करना है। देश में उद्योग के लिए जमीन अधिग्रहण से जुड़े इस बिल की राह में यह एक अहम पड़ाव है लेकिन यहीं से इसकी गुत्थियां भी शुरू होती हैं।


जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास बिल, 2011 को संसद से मंजूरी मिलने के बाद उद्योग के लिए जमीन खरीदने का सौदा विवादास्पद नहीं रहेगा और अब तक सिंगुर से लेकर नोएडा एक्सटेंशन में पैदा जन विरोधों का सामना नहीं करना पड़ेगा। इस बिल के प्रावधानों के मुताबिक निजी सेक्टर के लिए जमीन अधिग्रहण से पहले 80 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी जरूरी होगी। जबकि पीपीपी परियोजनाओं के लिए 70 फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी की शर्त रखी गई है।


लेकिन इन्हीं प्रावधानों ने इंडस्ट्री की चिंता बढ़ा दी है। रियल एस्टेट डेवलपर हों या फिर इन्फ्रास्ट्क्र्चर परियोजनाएं लाने वाली कंपनियां, हर कोई बढ़ी लागतों को लेकर चिंतित है। कॉन्फेडरेशन ऑफ रियल एस्टेट डेवलपर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के नेशनल प्रेसिडेंट ललित कुमार जैन का साफ कहना है कि अगर बिल अपने मौजूदा स्वरूप में पारित हो जाता है निश्चित तौर पर मकानों की कीमतें बढ़ जाएंगी।
अस्सी फीसदी जमीन मालिकों की मंजूरी का मतलब यह है कि पहले से ज्यादा लोगों को मुआवजा।


जाहिर है, अब परियोजनाओं के शुरू होने से पहले ही कंपनियों को एक बडी़ रकम मुआवजे के तौर पर देनी होगी। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में प्रोफेसर विवेक देवरॉय का कहना है कि निश्चित तौर पर इससे इंडस्ट्री की लागत बढ़ेगी और उसके ग्रोथ को मुश्किल में डालेगी। देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास में आगे काफी जोर होगा और जमीन की बढ़ी हुई कीमतों का इस पर असर पडऩा तय है।


जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया से जुड़े कुछ अन्य विशेषज्ञ भी इस राय से सहमत हैं। उनका कहना है कि इससे इंडस्ट्री की लागत तीन से चार गुणा तक बढ़ जाएगी। पुनर्वास की लागत  बढ़ जाएंगी और अधिग्रहण की प्रक्रिया काफी लंबी खिंच जाएगी। इंडस्ट्री इतना बोझ नहीं सकती है और जाहिर है इससे इसका विकास धीमा हो जाएगा।


सरकार ने इस बिल में पुनर्वास का जिम्मा भी उन निजी कंपनियों पर डाल दिया है, जो बहुत ही छोटी हैं। उनके लिए पुनर्वास की लागत उठाना मुश्किल है। इन कंपनियों का कहना है कि जब लोगों को बाजार कीमत पर मुआवजा मिल रहा है तो फिर अलग से पुनर्वास की लागत वहन करने के लिए दबाव डालना जायज नहीं होगा। इंडस्ट्री की बढ़ी हुई लागत का असर कीमतों पर बढ़ेगा और इससे महंगाई निश्चित तौर पर बढ़ेगी।


जमीन अधिग्रहण से जुड़ी प्रक्रिया को देख रहे एक उद्योग संगठन के प्रतिनिधि ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जमीन अधिग्रहण की बढ़ी लागतों का असर रोजगार पर दिखेगा। अगर लागतों की वजह से रियल एस्टेट या इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं की रफ्तार धीमी हुई तो इनमें पैदा होने वाले रोजगार की तादाद निश्चित तौर पर कम होंगे। खास कर अद्र्धकुशल श्रमिकों के सामने बेरोजगारी की स्थिति गंभीर होगी। इसलिए इंडस्ट्री संगठनों ने सरकार से मांग की है इस बिल में संतुलन पैदा करने की कोशिश करें।


हालांकि अर्थशास्त्रियों   का एक वर्ग इस राय से इत्तेफाक नहीं रखता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी में प्रोफेसर और वरिष्ठ अर्थशास्त्री ी एन आर. भानुमूर्ति का मानना है कि पहली बार जमीन अधिग्रहण और इससे जुड़े मुद्दे पर एक स्पष्ट माहौल तैयार हो गया है। पहले यह स्थिति नहीं थी। जमीन अधिग्रहण बिल के प्रावधानों से इंडस्ट्री की लागत  थोड़ी बढ़ेंगी। लेकिन इंडस्ट्री के निवेश लंबी अवधि के होते हैं। इतने लंबे समय के हिसाब से देखें तो इंडस्ट्री पर इस बढ़ी हुई लागत का कोई फर्क नहीं पड़ेगा। इसका बेहतरीन उदाहरण हरियाणा है। इस राज्य में उद्योग के लिए जमीन अधिग्रहण बेहतर तरीके से हो रहा है।


यहां जमीन की कीमतें ज्यादा है। फिर भी इंडस्ट्री बढ़ी हुई लागतों की शिकायत नहीं कर रही है। उसे मालूम है कि लंबी अवधि के निवेश के लिए इस बढ़ी हुई लागत से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। इसलिए उद्योग बढ़ी हुई लागतों को लेकर जो हायतौबा मचा रहा है उसमें दम नहीं है। इंडस्ट्री को अब इसे ध्यान में रख कर ही अपनी प्रतिस्पद्र्धा क्षमता बढ़ानी होगी। यह इंडस्ट्री पर निर्भर है कि वह बढ़ी हुई लागतों का बोझ उपभोक्ताओं पर किस हद तक डाले कि प्रतिस्पर्धा रह सके।


इस तरह देखा जाए तो उद्योग के सामने शुरु आत में अड़चनें आएंगी लेकिन यह बहुत मुश्किल भरी नहीं होंगी। सबसे अहम बात यह है कि अब जमीन अधिग्रहण और पुनर्वास नीति में चली आ रही अस्पष्टता खत्म हो चुकी है। सारी चीजें साफ हैं। इसलिए किसी एक प्रावधान की आड़ लेकर चीजों को उलझाना आसान नहीं रह जाएगा।

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