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सुनो... सुनो... सुनो... बुरी खबर नहीं है चीन में आर्थिक सुस्ती

Agency | Aug 16, 2013, 14:05PM IST
सुनो... सुनो... सुनो... बुरी खबर नहीं है चीन में आर्थिक सुस्ती

माइकल पेट्टीज
लेखक पीकिंग यूनिवर्सिटी में फाइनेंस के प्रोफेसर हैं और 'अवाइडिंग द फाल : चाइनाज इकनॉमिक रीस्ट्रक्चरिंगÓ के लेखक हैं, पेश है चीन के आर्थिक हालात पर उनका लेख

कल्पना करें कि किसी ने 1990 में यह अनुमान लगाया होता कि जापानी अर्थव्यवस्था (जिसके बारे में व्यापक तौर पर यह माना जा रहा था कि अगले एक-दो दशक में वह अमेरिका को पीछे छोड़ देगी) में अगले 20 साल में 1 फीसदी या उससे भी कम की दर से वृद्धि होगी तो क्या होता? इस बात की संभावना कम ही होती कि कोई व्यक्ति उस पर विश्वास करता और यदि किसी तरह कोई व्यक्ति इस पर भरोसा कर भी लेता तो शायद वह दो चिंताजनक निष्कर्षों पर पहुंच जाता।

पहला, जापान उस समय दुनिया का ग्रोथ इंजन माना जाता था, इसलिए जापानी आर्थिक वृद्धि के चरमराने से दुनिया एक अनियंत्रित मंदी के दौर में पहुंच जाएगी।

दूसरा, यदि कई दशकों से तेज वृद्धि कर रहे जापानी अर्थव्यवस्था में अचानक तेजी से गिरावट आती है तो निश्चित रूप से जापान में सामाजिक और राजनीतिक विप्लव की स्थिति पैदा हो सकती है।जापान अगले 20 साल में तो धीमी गति से ही बढ़ा, लेकिन बाकी दुनिया इसकी वजह से ठप नहीं पड़ी और न ही जापान के लोग गुस्से में सड़कों पर आए।

अब जब चीनी अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त पड़ रही है, दुनिया चीन के बारे में इसी तरह के सवाल कर रही है।विश्लेषकों ने आशंका जताई है कि चीनी ग्रोथ इंजन में तेजी न रहने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था के फिर से ठहर जाने का जोखिम आ सकता है।

क्या चीन सामाजिक अशांति और संभवत:किसी क्रांति के बिना 7 फीसदी से कम की वृद्धि दर सहन कर सकता है।यह समझने से कि इस तरह की चिंताएं जापान के मामले में गलत क्यों साबित हुईं, यह समझने में मदद मिल सकती है कि चीन के संबंध में भी ऐसी चिंताएं गलत क्यों साबित होंगी।

पहली चिंता की बात करते हैं, क्या चीन में आर्थिक सुस्ती से वैश्विक सुस्ती आ सकती है? संभवत:नहीं।इसकी वजह यह है कि चीन आज उस तरह से वैश्विक अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन नहीं है, जैसा कि 1980 के दशक में जापान था।यह वैश्विक आर्थिक वृद्धि में सबसे ज्यादा पत्रात्मक हिस्सा रखने वाला देश भर है।

दोनों की स्थिति एक जैसी लगती है, लेकिन तथ्य बहुत अलग हैं।आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था में कमी बस मांग की है और यदि किसी अर्थव्यवस्था को ग्लोबल ग्रोथ बनना है तो उसे बाकी दुनिया के लिए शुद्ध मांग का स्रोत होना चाहिए। लेकिन अपने बड़े व्यापारिक अधिशेष की वजह से चीन तो निश्चित रूप से ऐसा नहीं है।

बाकी दुनिया के लिए यह बात मायने नहीं रखती कि चीन कितनी तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि यह कि उसका व्यापार खाता किस तरह से आर्थिक पुनर्संतुलन बनाता है।

कुछ विश्लेषकों का तर्क हो सकता है कि चीन के केंद्रीय बैंक द्वारा अमेरिका के सरकारी बांड की खरीद का भी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर महत्वपूर्ण असर पड़ेगा क्योंंकि इससे अमेरिकी ब्याज दरें नियंत्रित रहेंगी।लेकिन मेरे ख्याल से यह तर्क पूरी तरह भ्रांति पर आधारित है।चीन द्वारा पूंजी का निर्यात इसलिए नहीं मायने नहीं रखता कि इससे अमेरिकी ब्याज दरों पर असर होता है, बल्कि इसलिए कि इसका व्यापार खाते पर असर पड़ता है।

एक व्यवस्थित पुनर्संतुलन की जरूरत है जिसमें चीन की बचत दर निवेश की तुलना में स्थायी तौर पर गिरती रहे, जिसके असर से व्यापारिक अधिशेष में इतनी कमी आ जाए कि बाकी दुनिया के लिए शुद्ध मांग में बढ़त हो।यदि पुनर्संतुलन को अच्छी तरह से व्यवस्थित नहीं किया गया तो इससे चीन के व्यापारिक अधिशेष में इतनी ज्यादा बढ़ोतरी हो सकती है कि पहले से ही मुश्किल में चल रही वैश्विक अर्थव्यवस्था और कमजोर हो जाएगी।

इसलिए चीन की वृद्धि दर सुस्त पडऩा बाकी दुनिया के लिए अच्छी है या बुरी यह इस बात पर निर्भर करता है कि यह चीन के व्यापार संतुलन को किस तरह से प्रभावित करता है।यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितने सहज तरीके से और प्रबलता से चीन अपने कर्ज वृद्धि को सीमित रख पाता है और अर्थव्यवस्था को पुनर्संतुलित कर पाता है।

कम से कम तीन ऐसे तरीके हैं जिनसे चीन के इस पुनर्संतुलन का असर दुनिया पर पड़ेगा।पहला, चीन में हार्ड कमोडिटी की बेहिसाब मांग (बाकी दुनिया की तुलना में जीडीपी में इसका हिस्सा पांच से दस गुना ज्यादा) उसके निवेश में वृद्ध िपर बहुत ज्यादा निर्भर रहने का नतीजा है।

चीन के पुनर्संतुलन का मतलब यह है कि निवेश में वृद्धि काफी कम की जाए जिससे चीन में हार्ड कमोडिटी की मांग में भारी गिरावट आए।इससे उन देशों को नुकसान होगा जिनकी वृद्धिहार्ड कमोडिटी की कीमतों पर निर्भर करती है, लेकिन ऐसे देशों को फायदा होगा जो कमोडिटी के शुद्ध रूप से आयातक हैं।

दूसरा, चीन कम से कम कुछ हद तक दुनिया का मैन्यूफैक्चरिंग वर्कशॉप बन गया है क्योंकि उसकी जिस कार्यप्रणाली (खासकर करेंसी को अंडरवैल्यूड रखने, कृत्रिम तरीके से ब्याज दरों को कम रखने और वेतन में कम बढ़ोतरी) से असंतुलित वृद्धि को बढ़ावा मिला है, उसी से उसकी निर्यात में प्रतिस्पर्धा क्षमता भी बढ़ी है।

जब चीन में पुनर्संतुलन होगा तो परिभाषा के मुताबिक निर्यात में उसकी प्रतिस्पर्धात्मकता कम होगी और यह खासकर विकासशील देशों में मैन्यूफैक्चरिंग के लिए सकारात्मक बात होगी।
तीसरा, चीन के पुनर्संतुलन का मतलब यह है कि मांग का आंशिक रूप से ट्रांसफर निवेश आधारित खर्च से उपभोग आधारित खर्च की तरफ होगा।

आर्थिक वृद्धि में कमी से निवेश में वृद्धि घटाने पर बेहिसाब ज्यादा असर होगा और खपत वृद्धि घटाने पर बहुत कम असर होगा।उदाहरण के लिए इससे किसी देश के कैपिटल गुड्स के निर्यातकों को वहां के कंज्यूमर गुड्स के निर्यातकों की तुलना में ज्यादा नुकसान होगा।

अब सवाल उठता है कि चीनी आर्थिक सुस्ती का सामाजिक असर क्या होगा।क्या आम चीनी 7 फीसदी से कम की वृद्धि दर को सहन कर पाएगा? चीनी वृद्धि दर सुस्त पडऩे का बाकी दुनिया पर जिस तरह का असर पड़ेगा उसी तरह से यह निर्धारित किया जा सकता है कि इसका आम चीनी नागरिकों पर क्या असर पड़ेगा।

यदि पुनर्संतुलन को सही तरीके से व्यवस्थित किया जाता है तो पारिवारिक आय में 6 से 7 फीसदी की वृद्धि के साथ जीडीपी वृद्धि को लगातार 3 से 4 फीसदी बनाए रखा जा सकता है। ऐसा होने पर आम चीनी के लिए कोई आफत नहीं आने वाली है। इसमें संदेह कम ही है कि चीनी अर्थव्यवस्था में अगले कुछ वर्षों  में तेजी से सुस्ती आ सकती है।

लेकिन इसका असर उतना साफ नहीं है जितना कि बहुत से लोग समझते हैं।यह इस बात पर निर्भर करता है कि कितने सफल और व्यवस्थित तरीके से पुनर्संतुलन की प्रक्रिया को चलाया जाता है, उस अभिजात्य वर्ग के भारी विरोध के बावजूद जिसे पिछले तीन दशकों में असंतुलित वृद्धि का बहुत ज्यादा फायदा हुआ है।
 

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