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इंटरनेट को इस्तेमाल करने की रणनीति

मार्क लियोनार्द | Jan 03, 2013, 01:11AM IST
इंटरनेट को इस्तेमाल करने की रणनीति

यह दिल दहला देने वाला दृश्य था। 26 अगस्त को चीनी शहर जियान में एक मेंथॉल टैंकर ने एक बस में टक्कर मार दी थी। छत्तीस लोग मारे गए थे। दुर्घटना के तुरंत बाद सड़क सुरक्षा के स्थानीय अधिकारी यांग दकाई की ऑनलाइन तस्वीरें हर जगह पहुंच गई।  इस तस्वीर ने लोगों में गुस्से की भारी लहर पैदा कर दी।


इंटरनेट पर सक्रिय लोगों ने अधिकारी के व्यवहार से लेकर उसकी विलासिता की बखिया उधेड़ कर दी। नेट पर सक्रिय लोगों ने उसके कई फोटो अपलोड कर दिए गए, जिनमें वह अलग-अलग किस्म की लक्जरी घडिय़ां पहने हुआ था। ये घडिय़ां उसकी सैलरी से कई गुणा ज्यादा कीमत की थीं। पिछले शुक्रवार को चीनी मीडिया ने खबर दी कि छानबीन के बाद दकाई को भ्रष्टाचार के आरोप में बर्खास्त कर दिया गया है।


यांग दकाई इंटरनेट पर सक्रिय लोगों का नया शिकार है। उनकी सक्रियता और गुस्सा उस दौर से बिल्कुल अलग है जब चीन में सरकार का राजनीति पर बहुत अधिक नियंत्रण था। इस तरह के स्कैं डल इस बात को समझने के  लिए काफी है, जो डेढ़ साल पहले एक सर्वेक्षण के दौरान आई थी। इस सर्वेक्षण के नतीजों में कहा गया था कि चीन सरकार के 70 फीसदी अधिकारी इंटरनेट के आतंक में जीते हैं।


पिछले कुछ वर्षों के दौरान सरकार में हर स्तर के अफसरों को इलेक्ट्रॉनिक प्रसार माध्यमों की निगरानी का सामना करना पड़ा है। इन माध्यमों में सक्रिय लोगों ने अधिकारियों की संपत्ति की वैल्यू और उनके रिश्तेदारों के कदाचारों का पता लगाकर भ्रष्टाचार की क रतूतों का खुलासा किया है। चीन की राजनीति में इंटरनेट का असर विरोधाभास भरा है। इंटरनेट चीन की एक पार्टी की मियाद और लंबी कर सकता है। जिस तरह बाजार ने चीन की कम्यूनिस्ट को बचा लिया था ठीक उसी तरह राज्य नियंत्रित इंटरनेट इसके नेतृत्व को सुरक्षित रख सकता है।


चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी के एक अहम सुधारक देंग ज्याओपिंग को बाजार की असीमित ताकत से डर था। वह समाजवाद की चीनी विशेषता को बाजार की खूबियों का दोहन करने वाले के तौर पर देखते रहे हैं। उनका मानना था कि सुधारों से वह इकोनॉमी पर अपना वर्चस्व स्थापित किए रहेंगे। भले ही अधिकारी इंटरनेट से डरे हुए हों लेकिन पार्टी ने एक महीन रणनीति अपना रखी है। इसके तहत वह नागरिकों को अपना मत रखने की स्वतंत्रता तो देती है लेकिन यह सर्वरों को अपने अधीन रखे हुए है।


चीन में 53 करोड़ से ज्यादा लोगों तक इंटरनेट की पहुंच है। इनमें से आधे लोगों तक साइना वुइबो की पहुंचा है जिसे चीन का ट्विटर भी कहा जाता है। वुइबो एक ऐसे सार्वजनिक मंच की तरह काम करता है जिसमें नेटिजन उन चीजों पर खबरों का आदान-प्रदान होता है जिसे चीन की मुख्यधारा का मीडिया प्रसारण के लिहाज से अति संवेदनशील समझता है। (यांग दकाई के मामले से यह स्पष्ट हो चुका है) हालांकि इस तरह के नेटवर्कों पर अधिकारियों और नीतियों के खिलाफ भड़ास निकाली जा सकती है। हालांकि चीन का इंटरनेट पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है।


नाम न छापने की शर्त पर चीन के एक इंटरनेट एक्जीक्यूटिव कहते हैं कि चीन के इस ग्रेट फायरवॉल से बाहर के लोगों को यहां की सेंसरशिप के बारे में पता नहीं चलता। यह सही है कि सरकार कुछ खास वेबसाइटों को ब्लॉक कर देती है और कुछ की-वर्ड का इस्तेमाल करती है। लेकिन यूजर को इन बाधाओं को पार करना आसान होता है।


चीनी सरकार को बाहर से आने वाली सूचनाओं की चिंता नहीं है। सरकार, लोगों की ओर से सामूहिक कदम उठाए जाने से डरती है। यही वजह है कि इसने लोगों के बीच विमर्श को संतुलित करने के लिए कंपनियों और लोगों को इनसोर्स कर रखा है।
चीनी ब्लॉगर माइकल एंती का कहना है कि चीनी सरकार 'ब्लॉक और क्लोन' की नीति पर चलती है।


चीन सरकार ने गूगल, ट्विटर और फेसबुक जैसी साइटों को बंद कर रखा है लेकिन उनके चीनी वर्जन लाने की छूट दे रखी है। इस शर्त पर कि  उनके सर्वर देश के भीतर ही होंगे। सरकार आंकड़ों तक आसान पहुंच बना सकती है और जहां मर्जी हो इस पर नियंत्रण भी कर सकती है। इस तरह सरकार के पास डाटा को ब्लॉक करने और वांछित लोगों के खिलाफ अभियान का अधिकार हासिल हो गया है।


रिसर्चरों का कहना है कम से कम 13 फीसदी सोशल पोस्ट चीन में सेंसर कर दिए जाते हैं। कहने का मतलब है कि सेंसरशिप का उद्देश्य आलोचना रोकना नहीं बल्कि सामूहिक एक्शन रोकना है। चीनी नेतृत्व का मानना है कि सरकार का बुरा दिखना उतना बुरा नहीं है जितना सामूहिक  एक्शन की क्षमता लिये किसी बहस को न रोक पाना। चीन में इंटरनेट सरकार की गवर्निंग स्ट्रेटजी का एक हिस्सा बनता जा रहा है।


हर अधिकारी का दिन अपने मेल पर साइटों पर आई टिप्पणियों के विश्लेषण से शुरू होता है। इससे उन्हें लोगों के बीच विमर्श के विषय और उनकी नब्ज का अंदाजा लगता है। चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी की ओर से सूचनाओं को खोलने और बंद करने के चुनिंदा तरीका अपनाए जाने का फायदा नहीं बल्कि घाटा हुआ है। हालांकि इस तरह के कदमों से स्थानीय अधिकारियों पर नकेल कसी है क्योंकि सर्वर केंद्र के अधीन हैं।


स्थानीय और प्रांतीय सरकारें सूचनाओं के प्रवाह को नियंत्रित करने में नाकाम रही हैं। एंती के मुताबिक केद्र सरकार सेंसर के अभाव को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल कर रही है। हारवर्ड, रिसर्च से पता चला है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल पहले जनता को संतुष्ट करने और फिर उसे डराने में किया जा रहा है। कुल मिलाकर इस मीडिया का इस्तेमाल सत्ता पर अपनी पकड़ को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है।


वेनझाऊ में 2011 में हुए बेहद त्रासदीपूर्ण ट्रेन हादसे के बाद सरकार ने चीनी रेल मंत्री के खिलाफ एक करोड़ मैसेज को अनुमति दे दी थी। उस दौरान वह सरकार में बैठे आला अफसरों के गुस्से के भी शिकार थे। इस तरह मंत्री के खिलाफ लोगों का गुस्सा सोशल मीडिया पर पांच दिनों तक छाया रहा। इसके बाद फरवरी से अप्रैल तक बो शिलाई के मामले में मुक्त इंटरनेट पर बहस चलती रही।


माना जाता रहा कि  बो और उसकी पत्नी के कारनामों को सरकार में बैठे लोगों ही सोशनल मीडिया पर हवा दी थी ताकि पार्टी में उनकी दावेदारी कमजोर की जा सके। बहरहाल चीन के नेताओं को लग रहा है क में वे आग की दरिया से खेल रहे हैं लेकिन इसे काबू करना इतना आसान नहीं है। हालांकि इंटरनेट एक पार्टी की वैधानिकता को लंबे समय तक ढोता रहेगा, इसमें संदेह नहीं है।


मार्क लियोनार्द
लेखक स्तंभकार हैं। सोशल मीडिया पर चीन की रणनीति का खुलासा करता उनका लेख।

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