मौजूदा आयकर अधिनियम के तहत ऐसे कई प्रावधान हैं जो हाउस प्रॉपर्टी के कंस्ट्रक्शन से जुड़े हुए हैं। व्यक्तिगत करदाताओं को यह प्रावधान बहुत हद तक प्रभावित करते हैं। आइए देखते हैं कि हाउस प्रॉपर्टी से जुड़े कौन-कौन से प्रावधान हैं जो करदाताओं को कटौती और छूट का लाभ दिलाते हैं।
हाउसिंग लोन के पुनर्भुगतान (रीपेमेंट) पर कटौती
वर्तमान आयकर अधिनियम की धारा 80सी के तहत एक लाख रुपये सालाना तक के मूलधन के भुगतान पर विशेष संस्थानों और इकाइयों को कटौती का लाभ मिलता है। हालांकि, धारा 80सी के दायरे में निवेश के कई और विकल्प भी आते हैं पर इस लेख में हम चर्चा केवल प्रॉपर्टी की करेंगे।
कटौती का यह लाभ तभी मिल सकता है जब प्रॉपर्टी का इस्तेमाल आप कर रहे हों यानी पजेशन मिल चुकी हो। होम लोन लेने और उसके वास्तविक पुनर्भुगतान के शुरू होने में तब मुश्किल से एक महीने का समय लगता है जब आप रेडी टू मूव प्रॉपर्टी खरीदते हैं।
हालांकि, अगर होम लोन मकान बनाने के लिए लिया गया है या इसके जरिये कोई निर्माणाधीन प्रॉपर्टी बुक की गई है तो सामान्यतया कर्जदाता निर्माण के पूरे होने तक मासिक किस्तों में मूलधन को शामिल नहीं करते हैं। अगर प्रॉपर्टी का निर्माण कार्य संपन्न होने में विलंब होता है तो कर्जदाता आपसे मूलधन के एक हिस्से का भुगतान करने को कह सकता है।
ऐसी परिस्थिति में आप मूलधन का भुगतान करते हुए भी आयकर का लाभ नहीं उठा पाएंगे क्योंकि ऐसी कटौतियों का आधार है कि ऐसी प्रॉपर्टी से होने वाली आय इनकम फ्रॉम हाउस प्रॉपर्टी के तहत आती है। प्रॉपर्टी तब तक कर के दायरे में नहीं आती जब तक इनकम फ्रॉम हाउस प्रॉपर्टी के तहत टैक्सेशन वाली प्रॉपर्टी आपके पजेशन में न हो।
इसलिए जब आप निर्माणाधीन प्रॉपर्टी बुक कराते हैं तो आपको यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि आपको होम लोन के पुनर्भुगतान पर आयकर का लाभ मिल पाए। इस बात का ध्यान रखना भी जरूरी है कि प्रस्तावित डायरेक्ट टैक्स कोड में होम लोन के पुनर्भुगतान पर आयकर में किसी तरह के लाभ मिलने का प्रावधान नहीं है।
ब्याज के भुगतान पर कटौती का लाभ
आयकर अधिनियम की धारा 24 के तहत आप घर की खरीदारी, निर्माण, मरम्मत, पुनर्निर्माण आदि के लिए उठाए गए होम लोन के ब्याज का भुगतान कर कटौती का लाभ पा सकते हैं। उपरोक्त उद्देश्यों से लिए गए लोन के ब्याज के भुगतान का दावा करने के लिए घर का आपकी पजेशन में होना जरूरी है जैसा कि हम मूलधन के भुगतान के मामले में पहले ही देख चुके हैं।
हालांकि, आयकर अधिनियम आपको इस बात की अनुमति देता है कि पजेशन मिलने तक किए गए ब्याज के भुगतान पर भी आप कटौती का लाभ उठा सकते हैं। ब्याज के ऐसे भुगतान को प्री-ईएमआई पेमेंट कहते हैं। प्री-ईएमआई ब्याज का दावा पांच बराबर किस्तों में उस वित्त वर्ष से किया जा सकता है जिसमें प्रॉपर्टी का निर्माण पूरा हो गया है और पजेशन दी जा चुकी है। ऐसी पहली किस्त का दावा उस वित्त वर्ष में आप कर सकते हैं जिसमें आपको प्रॉपर्टी की पजेशन मिली है।
ब्याज पर टैक्स छूट होगी कम
इसके अलावा जिस अवधि के दौरान प्रॉपर्टी का निर्माण पूरा हुआ वह भी खुद के कब्जे वाली प्रॉपर्टी के मामले में काफी महत्वपूर्ण है। आमतौर पर खुद के कब्जे वाली प्रॉपर्टी पर लोन के ब्याज पर आप 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट का दावा कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए प्रॉपर्टी का निर्माण और मालिकाना हक लोन लेने की तारीख से तीन वित्त वर्षों तक हो जाना चाहिए। यदि तीन साल में निर्माण पूरा नहीं होता और हक नहीं मिलता है तो टैक्स छूट केवल 30,000 रुपये तक ही मिल सकती है।
प्रॉपर्टी बेचने में भी रखें वक्त की अहम भूमिका
इसके अलावा प्रॉपर्टी पर कैपिटल गेन टैक्स में छूट के मामले में अनुच्छेद 54 महत्वपूर्ण है। इसके तहत आप किसी भी हाउसिंग प्रॉपर्टी को यदि तीन साल रखने के बाद बेचते हैं तो लांग टर्म कैपिटल गेन टैक्स में छूट पा सकते हैं। आप घर बेचने से होने वाले मुनाफे यानी कैपिटल गेन को बिक्री से एक साल पहले या बिक्री के दो साल बाद तक दूसरी प्रॉपर्टी में निवेश कर इस टैक्स से बच सकते हैं।
इसके अलावा बिक्री से तीन साल के भीतर आप नए घर के निर्माण में भी इस राशि को खर्च कर टैक्स बचा सकते हैं। किसी बिल्डर के निर्माणाधीन प्रोजेक्ट में घर की बुकिंग भी निर्माण के तहत गिनी जाती है। ध्यान रखें यदि बेची गई प्रॉपर्टी कमर्शियल है तो केवल कैपिटल गेन नहीं बल्कि पूरी राशि दूसरी प्रॉपर्टी खरीदने में खर्च करनी पड़ेगी यदि टैक्स छूट लेनी है।
ऐसे में यह सुनिश्चित कर लें कि पहली प्रॉपटी बेचने से तीन साल के भीतर नई प्रॉपर्टी का निर्माण हो जाए। इस बात को ध्यान रखें कि टैक्स छूट के लिए निर्माण के पूरे होने का समय और हक मिलने का समय महत्वपूर्ण है। वहीं, घर की बिक्री पर टैक्स छूट के लिए भी समय सीमा का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।
मुझे पूरी उम्मीद है कि उपरोक्त चर्चा से आप मौजूदा आयकर अधिनियमों के अनुसार विभिन्न लाभों के लिए पजेशन काफी महत्वपूर्ण है। अगर आप निर्माण की समय-सीमा के मामले में सतर्कता नहीं बरतते हैं तो हो सकता है आयकर के कुछ लाभ आपको न मिल पाएं। इसलिए आह्ल से ही समय-सीमा का ध्यान रखना शुरू कर दें और आयकर के नियम आपको यह अनुशासन भी सिखाते हैं।
बलवंत जैन - लेखक अपनापैसा डॉट कॉम के चीफ फाइनेंशियल ऑफिसर हैं।