यह ऐसे शेयर होते हैं जिन्हें कंपनी अपने पास रखती है। चूंकि इन्हें ट्रेजरी में रखा जाता है इसलिए इन्हें ट्रेजरी शेयर कहा जाता है। इन्हें शेयर होल्डर से वापस या दोबारा खरीदा जा सकता है। साथ ही इन्हें जनता के लिए इश्यू नहीं किया जाता है। ये शेयर सामान्य शेयर से कई मामलों में अलग होते हैं उदाहरण के लिए इन पर कोई डिविडेंड नहीं मिलता है।
इनके पास कोई वोटिंग अधिकार नहीं होता है। जब किसी के कंपनी के शेयर प्राथमिक तौर पर जारी किए जाते हैं तो उस समय सारे ही शेयरों को पब्लिक के लिए जारी नहीं किया जाता है।
इनमें से कुछ शेयरों को कंपनी अपने पास रख लेती है। इन शेयरों को कंपनी अपने पास इसलिए रखती है ताकि जरूरत पडऩे पर कंपनी बाजार से कैश जुटा सके। साथ ही इनका एक दूसरा उद्देश्य यह होता है कि कंपनी को होस्टाइल टेकओवर से बचाया जा सके। ट्रेजरी शेयर का निर्माण उस स्थिति में भी किया जा सकता है जब कंपनी ओपन बाजार से अपने शेयर खरीदती है।
हालांकि हमेशा ही अपने शेयरों को खरीदना अच्छा नहीं माना जाता है।ट्रेजरी शेयर कंपनी के कैपिटलाइजेशन से ज्यादा नहीं हो सकता है। हालांकि यह सीमा हर देश के कानून पर निर्भर करती है। इससे कंपनी को यह फायदा होता कि इन्हें खरीदने पर कंपनी के वास्तविक शेयरों की कीमत पर कोई प्रभाव नहीं होता है।